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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 107"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 107

**चौ०** 
> कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे॥  
> कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के॥१॥

भावार्थ: कुशल पूछकर मुनिराजने उनको आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृतके ही बने हों, ऐसे अच्छे-अच्छे कन्द, मूल, फल और अंकुर लाकर दिये॥ १ ॥

**चौ०** 
> सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए॥  
> भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे॥२॥

भावार्थ: सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुहसहित श्रीरामचन्द्रजीने उन सुन्दर मूल-फलोंको बड़ी रुचिके साथ खाया। थकावट दूर होनेसे श्रीरामचन्द्रजी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजीने उनसे कोमल वचन कहे— ॥ २ ॥

**चौ०** 
> आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू॥  
> सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥३॥

भावार्थ: हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनोंका समुदाय भी सफल हो गया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी॥  
> अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू॥४॥

भावार्थ: लाभकी सीमा और सुखकी सीमा [ प्रभुके दर्शनको छोड़कर ] दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शनसे मेरी सब आशाएँ पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥ ४ ॥

**दो०** 
> करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।  
> तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥१०७॥

भावार्थ: जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता॥ १०७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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