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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 103"
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lang: "hi"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 103

**चौ०** 
> तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥  
> सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥१॥

भावार्थ: फिर रघुकुलके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजीको सिर नवाया। सीताजीने हाथ जोड़कर गङ्गाजीसे कहा—हे माता! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा॥१॥

**चौ०** 
> पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥  
> सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥२॥

भावार्थ: जिससे मैं पति और देवरके साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजीकी प्रेमरसमें सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजीके निर्मल जलमेंसे श्रेष्ठ वाणी हुई—॥२॥

**चौ०** 
> सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥  
> लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥३॥

भावार्थ: हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत्‌में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [ कृपादृष्टिसे ] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं॥३॥

**चौ०** 
> तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥  
> तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥४॥

भावार्थ: तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी॥४॥

**दो०** 
> प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।  
> पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥१०३॥

भावार्थ: तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्‌भरमें छा जायगा॥१०३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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