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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 101"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 101

**चौ०** 
> कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥  
> बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥१॥

भावार्थ: कृपाके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवटसे मुसकराकर बोले—भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे॥ १ ॥

**चौ०** 
> जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥  
> सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥२॥

भावार्थ: एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागरके पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [ वामनावतारमें ] जगत्‌को तीन पगसे भी छोटा कर दिया था ( दो ही पगमें त्रिलोकीको नाप लिया था ), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [ गङ्गाजीसे पार उतारनेके लिये ] केवटका निहोरा कर रहे हैं!॥ २ ॥

**चौ०** 
> पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥  
> केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥३॥

भावार्थ: प्रभुके इन वचनोंको सुनकर गङ्गाजीकी बुद्धि मोहसे खिंच गयी थी [ कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारनेके लिये केवटका निहोरा कैसे कर रहे हैं ]। परन्तु [ समीप आनेपर अपनी उत्पत्तिके स्थान ] पदनखोंको देखते ही [ उन्हें पहचानकर ] देवनदी गङ्गाजी हर्षित हो गयीं। ( वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर कठौतेमें भरकर जल ले आया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥  
> बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥४॥

भावार्थ: अत्यन्त आनन्द और प्रेममें उमँगकर वह भगवान्‌के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्यकी राशि कोई नहीं है॥ ४ ॥

**दो०** 
> पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।  
> पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥१०१॥

भावार्थ: चरणोंको धोकर और सारे परिवारसहित स्वयं उस जल ( चरणोदक ) को पीकर पहले [ उस महान् पुण्यके द्वारा ] अपने पितरोंको भवसागरसे पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रको गङ्गाजीके पार ले गया॥ १०१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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