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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 100"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 100

**चौ०** 
> जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥  
> बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥१॥

भावार्थ: जिनके वियोगमें पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोगमें प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने जबर्दस्ती सुमन्त्रको लौटाया। तब आप गङ्गाजीके तीरपर आये॥१॥

**चौ०** 
> मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥  
> चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥२॥

भावार्थ: श्रीरामने केवटसे नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा—मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद ) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलोंकी धूलके लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है,॥२॥

**चौ०** 
> छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥  
> तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥३॥

भावार्थ: जिसके छूते ही पत्थरकी शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [ मेरी नाव तो काठकी है ]। काठ पत्थरसे कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनिकी स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [ अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी ] ( मेरी कमाने-खानेकी राह ही मारी जायगी )॥३॥

**चौ०** 
> एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥  
> जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥४॥

भावार्थ: मैं तो इसी नावसे सारे परिवारका पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने ( धो लेने ) के लिये कह दो॥४॥

**छं०** 
> पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं।  
> मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥  
> बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।  
> तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

भावार्थ: हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगोंको नावपर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजीकी सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरोंको पखार न लूँगा, तबतक हे तुलसीदासके नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।

**सो०** 
> सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।  
> बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥१००॥

भावार्थ: केवटके प्रेममें लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजीकी ओर देखकर हँसे॥१००॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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