---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 1"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-1"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 1

**चौ०** 
> जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥  
> भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥१॥

भावार्थ: जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे [ अयोध्यामें ] नित्य नये मङ्गल हो रहे हैं और आनन्दके बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोकरूपी बड़े भारी पर्वतोंपर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥  
> मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥२॥

भावार्थ: ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्तिरूपी सुहावनी नदियाँ उमड़-उमड़कर अयोध्यारूपी समुद्रमें आ मिलीं। नगरके स्त्री-पुरुष अच्छी जातिके मणियोंके समूह हैं, जो सब प्रकारसे पवित्र, अमूल्य और सुन्दर हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥  
> सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥३॥

भावार्थ: नगरका ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजीकी कारीगरी बस इतनी ही है। सब नगरनिवासी श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको देखकर सब प्रकारसे सुखी हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥  
> राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥४॥

भावार्थ: सब माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथरूपी बेलको फली हुई देखकर आनन्दित हैं। श्रीरामचन्द्रजीके रूप, गुण, शील और स्वभावको देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनन्दित होते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।  
> आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥१॥

भावार्थ: सबके हृदयमें ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजीको मनाकर ( प्रार्थना करके ) कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजीको युवराजपद दे दें॥ १ ॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/mangalacharan  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-2

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
