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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 8"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 8

**चौ०** 
> कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला॥  
> जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा॥१॥

भावार्थ: मुनिने कहा—हे कृपालु रघुवीर! हे शंकरजीके मनरूपी मानसरोवरके राजहंस! सुनिये, मैं ब्रह्मलोकको जा रहा था। [ इतनेमें ] कानोंसे सुना कि श्रीरामजी वनमें आवेंगे॥१॥

**चौ०** 
> चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती॥  
> नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना॥२॥

भावार्थ: तबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूँ। अब ( आज ) प्रभुको देखकर मेरी छाती शीतल हो गयी। हे नाथ! मैं सब साधनोंसे हीन हूँ। आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की है॥२॥

**चौ०** 
> सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा॥  
> तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी॥३॥

भावार्थ: हे देव! यह कुछ मुझपर आपका एहसान नहीं है। हे भक्त-मनचोर! ऐसा करके आपने अपने प्रणकी ही रक्षा की है। अब इस दीनके कल्याणके लिये तबतक यहाँ ठहरिये, जबतक मैं शरीर छोड़कर आपसे [ आपके धाममें न ] मिलूँ॥३॥

**चौ०** 
> जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा॥  
> एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा॥४॥

भावार्थ: योग, यज्ञ, जप, तप जो कुछ व्रत आदि भी मुनिने किया था, सब प्रभुको समर्पण करके बदलेमें भक्तिका वरदान ले लिया। इस प्रकार [ दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर ] चिता रचकर मुनि शरभंगजी हृदयसे सब आसक्ति छोड़कर उसपर जा बैठे॥४॥

**दो०** 
> सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।  
> मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरूप श्रीराम॥८॥

भावार्थ: हे नीले मेघके समान श्याम शरीरवाले सगुणरूप श्रीरामजी! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित प्रभु ( आप ) निरन्तर मेरे हृदयमें निवास कीजिये॥८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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