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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 7"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 7

**चौ०** 
> मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा॥  
> आगें राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें॥१॥

भावार्थ: मुनिके चरणकमलोंमें सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियोंके स्वामी श्रीरामजी वनको चले। आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं। दोनों ही मुनियोंका सुन्दर वेष बनाये अत्यन्त सुशोभित हैं॥१॥

**चौ०** 
> उभय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी॥  
> सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं बर बाटा॥२॥

भावार्थ: दोनोंके बीचमें श्रीजानकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीच माया हो। नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, सभी अपने स्वामीको पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं॥२॥

**चौ०** 
> जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया। करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया॥  
> मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता॥३॥

भावार्थ: जहाँ-जहाँ देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहाँ-वहाँ बादल आकाशमें छाया करते जाते हैं। रास्तेमें जाते हुए विराध राक्षस मिला। सामने आते ही श्रीरघुनाथजीने उसे मार डाला॥३॥

**चौ०** 
> तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा॥  
> पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा॥४॥

भावार्थ: [ श्रीरामजीके हाथसे मरते ही ] उसने तुरंत सुन्दर ( दिव्य ) रूप प्राप्त कर लिया। दुःखी देखकर प्रभुने उसे अपने परम धामको भेज दिया। फिर वे सुन्दर छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीके साथ वहाँ आये जहाँ मुनि शरभंगजी थे॥४॥

**दो०** 
> देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।  
> सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग॥७॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीका मुखकमल देखकर मुनिश्रेष्ठके नेत्ररूपी भौंरे अत्यन्त आदरपूर्वक उसका [ मकरन्दरस ] पान कर रहे हैं। शरभंगजीका जन्म धन्य है॥७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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