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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 5b"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 5b

**चौ०** 
> अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता॥  
> रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई॥१॥

भावार्थ: फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [ अत्रिजीकी पत्नी ] अनसूयाजीके चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्नीके मनमें बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीताजीको पास बैठा लिया॥ १ ॥

**चौ०** 
> दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए॥  
> कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी॥२॥

भावार्थ: और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य-नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणीसे स्त्रियोंके कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं॥ २ ॥

**चौ०** 
> मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥  
> अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥३॥

भावार्थ: हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमातक ही [ सुख ] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [ मोक्षरूप ] असीम [ सुख ] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती॥३॥

**चौ०** 
> धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥  
> बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥४॥

भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री—इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन— ॥४॥

**चौ०** 
> ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥  
> एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥५॥

भावार्थ: ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है। शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है॥५॥

**चौ०** 
> जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥  
> उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥६॥

भावार्थ: जगत्‌में चार प्रकारकी पतिव्रताएँ हैं वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणीकी पतिव्रताके मनमें ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत्‌में [ मेरे पतिको छोड़कर ] दूसरा पुरुष स्वप्नमें भी नहीं है॥६॥

**चौ०** 
> मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥  
> धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥७॥

भावार्थ: मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। ( अर्थात्‌ समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है। ) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट ( निम्नश्रेणीकी ) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं॥७॥

**चौ०** 
> बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥  
> पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥८॥

भावार्थ: और जो स्त्री मौका न मिलनेसे या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत्‌में उसे अधम स्त्री जानना। पतिको धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पतिसे रति करती है, वह तो सौ कल्पतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है॥८॥

**चौ०** 
> छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥  
> बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥९॥

भावार्थ: क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ ( असंख्य ) जन्मोंके दुःखको नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है॥९॥

**चौ०** 
> पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई । बिधवा होइ पाइ तरुनाई ॥१०॥

भावार्थ: किन्तु जो पतिके प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर ( भरी जवानीमें ) विधवा हो जाती है॥१०॥

**सो०** 
> सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।  
> जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥५ (क)॥

भावार्थ: स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किन्तु पतिकी सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [ पातिव्रतधर्मके कारण ही ] आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान्‌को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं॥५ ( क )॥

**सो०** 
> सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं।  
> तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित॥५ (ख)॥

भावार्थ: हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले-लेकर स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मका पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीरामजी प्राणोंके समान प्रिय हैं, यह ( पातिव्रतधर्मकी ) कथा तो मैंने संसारके हितके लिये कही है॥५ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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