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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 46b"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 46b

**चौ०** 
> निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं॥  
> सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीती॥१॥

भावार्थ: कानोंसे अपने गुण सुननेमें सकुचाते हैं, दूसरोंके गुण सुननेसे विशेष हर्षित होते हैं। सम और शीतल हैं, न्यायका कभी त्याग नहीं करते। सरलस्वभाव होते हैं और सभीसे प्रेम रखते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा॥  
> श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥२॥

भावार्थ: वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और नियममें रत रहते हैं और गुरु, गोविन्द तथा ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणोंमें निष्कपट प्रेम होता है॥ २ ॥

**चौ०** 
> बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना॥  
> दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ॥३॥

भावार्थ: तथा वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान (परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) और वेद-पुराणका यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्गपर पैर नहीं रखते॥ ३ ॥

**चौ०** 
> गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला॥  
> मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते॥४॥

भावार्थ: सदा मेरी लीलाओंको गाते-सुनते हैं और बिना ही कारण दूसरोंके हितमें लगे रहनेवाले होते हैं। हे मुनि! सुनो, संतोंके जितने गुण हैं, उनको सरस्वती और वेद भी नहीं कह सकते॥ ४ ॥

**छं०** 
> कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे।  
> अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥  
> सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए।  
> ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥

भावार्थ: ‘शेष और शारदा भी नहीं कह सकते’ यह सुनते ही नारदजीने श्रीरामजीके चरणकमल पकड़ लिये। दीनबन्धु कृपालु प्रभुने इस प्रकार अपने श्रीमुखसे अपने भक्तोंके गुण कहे। भगवान्‌के चरणोंमें बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि वे पुरुष धन्य हैं, जो सब आशा छोड़कर केवल श्रीहरिके रंगमें रँग गये हैं।

**दो०** 
> रावनारि जसु पावन गावहिं सुनहिं जे लोग।  
> राम भगति दृढ़ पावहिं बिनु बिराग जप जोग॥४६ (क)॥

भावार्थ: जो लोग रावणके शत्रु श्रीरामजीका पवित्र यश गावेंगे और सुनेंगे, वे वैराग्य, जप और योगके बिना ही श्रीरामजीकी दृढ़ भक्ति पावेंगे॥ ४६ (क)॥

**दो०** 
> दीप सिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग।  
> भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग॥४६ (ख)॥

भावार्थ: युवती स्त्रियोंका शरीर दीपककी लौके समान है, हे मन! तू उसका पतिंगा न बन। काम और मदको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीका भजन कर और सदा सत्संग कर॥ ४६ (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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