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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 4"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 4

श्रीसीता-अनसूया-मिलन और श्रीसीताजीको अनसूयाजीका पातिव्रतधर्म कहना

**छं०** 
> नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं॥  
> भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं॥१॥

भावार्थ: हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषोंको अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ॥ १ ॥

**छं०** 
> निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं॥  
> प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं॥२॥

भावार्थ: आप नितान्त सुन्दर श्याम, संसार [ आवागमन ] रूपी समुद्रको मथनेके लिये मन्दराचलरूप, फूले हुए कमलके समान नेत्रोंवाले और मद आदि दोषोंसे छुड़ानेवाले हैं॥ २ ॥

**छं०** 
> प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं॥  
> निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं॥३॥

भावार्थ: हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओंका पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय ( बुद्धिके परे अथवा असीम ) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करनेवाले तीनों लोकोंके स्वामी, ॥ ३ ॥

**छं०** 
> दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं॥  
> मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं॥४॥

भावार्थ: सूर्यवंशके भूषण, महादेवजीके धनुषको तोड़नेवाले, मुनिराजों और संतोंको आनन्द देनेवाले तथा देवताओंके शत्रु असुरोंके समूहका नाश करनेवाले हैं॥ ४ ॥

**छं०** 
> मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं॥  
> विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं॥५॥

भावार्थ: आप कामदेवके शत्रु महादेवजीके द्वारा वन्दित, ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह और समस्त दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं॥ ५ ॥

**छं०** 
> नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं॥  
> भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं॥६॥

भावार्थ: हे लक्ष्मीपते! हे सुखोंकी खान और सत्पुरुषोंकी एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे शचीपति ( इन्द्र ) के प्रिय छोटे भाई ( वामनजी )! स्वरूपा-शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित आपको मैं भजता हूँ॥ ६ ॥

**छं०** 
> त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः॥  
> पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥७॥

भावार्थ: जो मनुष्य मत्सर ( डाह ) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क ( अनेक प्रकारके सन्देह ) रूपी तरङ्गोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते ( आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते )॥ ७॥

**छं०** 
> विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा॥  
> निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥८॥

भावार्थ: जो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इन्द्रियादिका निग्रह करके ( उन्हें विषयोंसे हटाकर ) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको ( अपने स्वरूपको ) प्राप्त होते हैं॥ ८॥

**छं०** 
> तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं॥  
> जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥९॥

भावार्थ: उन ( आप ) को जो एक ( अद्वितीय ), अद्भुत ( मायिक जगत्‌से विलक्षण ), प्रभु ( सर्वसमर्थ ), इच्छारहित, ईश्वर ( सबके स्वामी ), व्यापक, जगद्‌गुरु, सनातन ( नित्य ), तुरीय ( तीनों गुणोंसे सर्वथा परे ) और केवल ( अपने स्वरूपमें स्थित ) हैं॥ ९॥

**छं०** 
> भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं॥  
> स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥१०॥

भावार्थ: [ तथा ] जो भावप्रिय, कुयोगियों ( विषयी पुरुषों ) के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष ( अर्थात् उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ), सम ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ॥ १० ॥

**छं०** 
> अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं॥  
> प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥११॥

भावार्थ: हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरणकमलोंकी भक्ति दीजिये॥ ११ ॥

**छं०** 
> पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं॥  
> व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥१२॥

भावार्थ: जो मनुष्य इस स्तुतिको आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर आपके परमपदको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं॥ १२ ॥

**दो०** 
> बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।  
> चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि॥४॥

भावार्थ: मुनिने [ इस प्रकार ] विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े॥ ४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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