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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 37b"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 37b

**चौ०** 
> चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ॥  
> बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने उस वनको भी छोड़ दिया और वे आगे चले। दोनों भाई अतुलनीय बलवान् और मनुष्योंमें सिंहके समान हैं। प्रभु विरहीकी तरह विषाद करते हुए अनेकों कथाएँ और संवाद कहते हैं— ॥१॥

**चौ०** 
> लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा॥  
> नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा॥२॥

भावार्थ: हे लक्ष्मण! जरा वनकी शोभा तो देखो। इसे देखकर किसका मन क्षुब्ध नहीं होगा? पक्षी और पशुओंके समूह सभी स्त्रीसहित हैं। मानो वे मेरी निन्दा कर रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं॥  
> तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए॥३॥

भावार्थ: हमें देखकर [ जब डरके मारे ] हिरनोंके झुंड भागने लगते हैं, तब हिरनियाँ उनसे कहती हैं—तुमको भय नहीं है। तुम तो साधारण हिरनोंसे पैदा हुए हो, अतः तुम आनन्द करो। ये तो सोनेका हिरन खोजने आये हैं॥३॥

**चौ०** 
> संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं॥  
> सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ॥४॥

भावार्थ: हाथी हथिनियोंको साथ लगा लेते हैं। वे मानो मुझे शिक्षा देते हैं [ कि स्त्रीको कभी अकेली नहीं छोड़ना चाहिये ]। भलीभाँति चिन्तन किये हुए शास्त्रको भी बार-बार देखते रहना चाहिये। अच्छी तरह सेवा किये हुए भी राजाको वशमें नहीं समझना चाहिये॥ ४॥

**चौ०** 
> राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं॥  
> देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा॥५॥

भावार्थ: और स्त्रीको चाहे हृदयमें ही क्यों न रखा जाय; परन्तु युवती स्त्री, शास्त्र और राजा किसीके वशमें नहीं रहते। हे तात! इस सुन्दर वसन्तको तो देखो। प्रियाके बिना मुझको यह भय उत्पन्न कर रहा है॥ ५ ॥

**दो०** 
> बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।  
> सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल॥३७ (क)॥

भावार्थ: मुझे विरहसे व्याकुल, बलहीन और बिलकुल अकेला जानकर कामदेवने वन, भौंरों और पक्षियोंको साथ लेकर मुझपर धावा बोल दिया॥ ३७ ( क )॥

**दो०** 
> देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।  
> डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात॥३७ (ख)॥

भावार्थ: परन्तु जब उसका दूत यह देख गया कि मैं भाईके साथ हूँ ( अकेला नहीं हूँ ), तब उसकी बात सुनकर कामदेवने मानो सेनाको रोककर डेरा डाल दिया है॥ ३७ ( ख )॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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