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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 35"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 35

**चौ०** 
> पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥  
> केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥१॥

भावार्थ: फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गयीं। प्रभुको देखकर उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। [ उन्होंने कहा— ] मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? मैं नीच जातिकी और अत्यन्त मूढ़बुद्धि हूँ॥ १ ॥

**चौ०** 
> अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥  
> कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥२॥

भावार्थ: जो अधमसे भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यन्त अधम हैं; और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मन्दबुद्धि हूँ। श्रीरघुनाथजीने कहा—हे भामिनि! मेरी बात सुन। मैं तो केवल एक भक्तिहीका सम्बन्ध मानता हूँ॥ २ ॥

**चौ०** 
> जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥  
> भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥३॥

भावार्थ: जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता— इन सबके होनेपर भी भक्तिसे रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल [ शोभाहीन ] दिखायी पड़ता है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥  
> प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥४॥

भावार्थ: मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मनमें धारण कर। पहली भक्ति है संतोंका सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंगमें प्रेम॥ ४॥

**दो०** 
> गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।  
> चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥३५॥

भावार्थ: तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरुके चरणकमलोंकी सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहोंका गान करे॥ ३५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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