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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 27"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 27

श्रीसीताहरण और श्रीसीता-विलाप

**चौ०** 
> तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ॥  
> अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई॥१॥

भावार्थ: जब रावण उस वनके ( जिस वनमें श्रीरघुनाथजी रहते थे ) निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता। सोनेका शरीर मणियोंसे जड़कर बनाया था॥१॥

**चौ०** 
> सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा॥  
> सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला॥२॥

भावार्थ: सीताजीने उस परम सुन्दर हिरनको देखा, जिसके अङ्ग-अङ्गकी छटा अत्यन्त मनोहर थी। [ वे कहने लगीं— ] हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये। इस मृगकी छाल बहुत ही सुन्दर है॥२॥

**चौ०** 
> सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही॥  
> तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु संँवारन॥३॥

भावार्थ: जानकीजीने कहा—हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी [ मारीचके कपटमृग बननेका ] सब कारण जानते हुए भी, देवताओंका कार्य बनानेके लिये हर्षित होकर उठे॥३॥

**चौ०** 
> मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा॥  
> प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई॥४॥

भावार्थ: हिरनको देखकर श्रीरामजीने कमरमें फेंटा बाँधा और हाथमें धनुष लेकर उसपर सुन्दर ( दिव्य ) बाण चढ़ाया। फिर प्रभुने लक्ष्मणजीको समझाकर कहा—हे भाई! वनमें बहुत-से राक्षस फिरते हैं॥४॥

**चौ०** 
> सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी॥  
> प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी॥५॥

भावार्थ: तुम बुद्धि और विवेकके द्वारा बल और समयका विचार करके सीताकी रखवाली करना। प्रभुको देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े॥५॥

**चौ०** 
> निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा॥  
> कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई॥६॥

भावार्थ: वेद जिनके विषयमें ‘नेति-नेति’ कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते ( अर्थात्‌ जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं ), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है॥६॥

**चौ०** 
> प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी॥  
> तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा॥७॥

भावार्थ: इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभुको दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्रजीने तककर ( निशाना साधकर ) कठोर बाण मारा, [ जिसके लगते ही ] वह घोर शब्द करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥७॥

**चौ०** 
> लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा॥  
> प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा॥८॥

भावार्थ: पहले लक्ष्मणजीका नाम लेकर उसने पीछे मनमें श्रीरामजीका स्मरण किया। प्राणत्याग करते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजीका स्मरण किया॥८॥

**चौ०** 
> अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना॥९॥

भावार्थ: सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामजीने उसके हृदयके प्रेमको पहचानकर उसे वह गति ( अपना परमपद ) दी जो मुनियोंको भी दुर्लभ है॥९॥

**दो०** 
> बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।  
> निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ॥२७॥

भावार्थ: देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभुके गुणोंकी गाथाएँ ( स्तुतियाँ ) गा रहे हैं [ कि ] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुरको भी अपना परमपद दे दिया॥२७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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