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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 26"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 26

**चौ०** 
> जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी॥  
> गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा॥१॥

भावार्थ: अतः अपने कुलकी कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं ( दुर्वचन कहे )। [ कहा ] अरे मूर्ख! तू गुरुकी तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा कौन है?॥१॥

**चौ०** 
> तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना॥  
> सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी॥२॥

भावार्थ: तब मारीचने हृदयमें अनुमान किया कि शस्त्री ( शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जाननेवाला ), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्‌, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया—इन नौ व्यक्तियोंसे विरोध ( वैर ) करनेमें कल्याण ( कुशल ) नहीं होता॥२॥

**चौ०** 
> उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना॥  
> उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें॥३॥

भावार्थ: जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी ( अर्थात्‌ उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा )। [ सोचा कि ] उत्तर देते ही ( नाहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मार डालेगा। फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ?॥३॥

**चौ०** 
> अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा॥  
> मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही॥४॥

भावार्थ: हृदयमें ऐसा समझकर वह रावणके साथ चला। श्रीरामजीके चरणोंमें उसका अखण्ड प्रेम है। उसके मनमें इस बातका अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजीको देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावणको नहीं जनाया॥४॥

**छं०** 
> निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं।  
> श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं॥  
> निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी।  
> निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी॥

भावार्थ: [ वह मन-ही-मन सोचने लगा ] अपने परम प्रियतमको देखकर नेत्रोंको सफल करके सुख पाऊँगा। जानकीजीसहित और छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत कृपानिधान श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाऊँगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसीके वशमें न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान्‌ ) को भी वशमें करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्दके समुद्र श्रीहरि अपने हाथोंसे बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!

**दो०** 
> मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान।  
> फिरि फिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन॥२६॥

भावार्थ: धनुष-बाण धारण किये मेरे पीछे-पीछे पृथ्वीपर ( पकड़नेके लिये ) दौड़ते हुए प्रभुको मैं फिर-फिरकर देखूँगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है॥२६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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