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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 25"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 25

**चौ०** 
> दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें॥  
> होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी॥१॥

भावार्थ: भाग्यहीन रावणने सारी कथा अभिमानसहित उसके सामने कही [ और फिर कहा— ] तुम छल करनेवाले कपटमृग बनो, जिस उपायसे मैं उस राजवधूको हर लाऊँ॥१॥

**चौ०** 
> तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररूप चराचर ईसा॥  
> तासों तात बयरु नहिं कीजै। मारें मरिअ जिआएँ जीजै॥२॥

भावार्थ: तब उसने ( मारीचने ) कहा—हे दशशीश! सुनिये। वे मनुष्यरूपमें चराचरके ईश्वर हैं। हे तात! उनसे वैर न कीजिये। उन्हींके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना होता है ( सबका जीवन-मरण उन्हींके अधीन है )॥२॥

**चौ०** 
> मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा॥  
> सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं॥३॥

भावार्थ: यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये गये थे। उस समय श्रीरघुनाथजीने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभरमें सौ योजनपर आ गिरा। उनसे वैर करनेमें भलाई नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई॥  
> जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा॥४॥

भावार्थ: मेरी दशा तो भृङ्गीके कीड़ेकी-सी हो गयी है। अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंको ही देखता हूँ। और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करनेमें पूरा न पड़ेगा ( सफलता नहीं मिलेगी )॥४॥

**दो०** 
> जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।  
> खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड॥२५॥

भावार्थ: जिसने ताड़का और सुबाहुको मारकर शिवजीका धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिराका वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है?॥२५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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