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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 23"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 23

**चौ०** 
> सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥  
> खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥ १ ॥

भावार्थ: [ वह मन-ही-मन विचार करने लगा— ] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियोंमें कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवकको भी पा सके। खर-दूषण तो मेरे ही समान बलवान्‌ थे। उन्हें भगवान्‌के सिवा और कौन मार सकता है?॥१॥

**चौ०** 
> सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा॥  
> तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ॥ २ ॥

भावार्थ: देवताओंको आनन्द देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्‌ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभुके बाण [ के आघात ] से प्राण छोड़कर भवसागरसे तर जाऊँगा॥२॥

**चौ०** 
> होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा॥  
> जौं नररूप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ॥ ३ ॥

भावार्थ: इस तामस शरीरसे भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्मसे यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनोंको रणमें जीतकर उनकी स्त्रीको हर लूँगा॥३॥

**चौ०** 
> चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ॥  
> इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई॥४॥

भावार्थ: [ यों विचारकर ] रावण रथपर चढ़कर अकेला ही वहाँ चला, जहाँ समुद्रके तटपर मारीच रहता था। [ शिवजी कहते हैं कि— ] हे पार्वती! यहाँ श्रीरामचन्द्रजीने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो॥४॥

**दो०** 
> लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।  
> जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद॥२३॥

भावार्थ: लक्ष्मणजी जब कन्द-मूल-फल लेनेके लिये वनमें गये, तब [ अकेलेमें ] कृपा और सुखके समूह श्रीरामचन्द्रजी हँसकर जानकीजीसे बोले— ॥२३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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