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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 20b"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 20b

शूर्पणखाका रावणके निकट जाना, श्रीसीताजीका अग्नि-प्रवेश और माया-सीता

**छं०** 
> तब चले बान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल॥  
> कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम॥१॥

भावार्थ: तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत-से सर्प जा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी संग्राममें क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले॥१॥

**छं०** 
> अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर॥  
> भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ॥२॥

भावार्थ: अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंको देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले। तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले—जो रणसे भागकर जायगा, ॥२॥

**छं०** 
> तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि॥  
> आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार॥३॥

भावार्थ: उसका हम अपने हाथों वध करेंगे। तब मनमें मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेकों प्रकारके हथियारोंसे श्रीरामजीपर प्रहार करने लगे॥३॥

**छं०** 
> रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि॥  
> छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच॥४॥

भावार्थ: शत्रुको अत्यन्त कुपित जानकर प्रभुने धनुषपर बाण चढ़ाकर बहुत-से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे॥४॥

**छं०** 
> उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन॥  
> चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान॥५॥

भावार्थ: उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथीकी तरह चिग्घाड़ते हैं। उनके पहाड़के समान धड़ कट-कटकर गिर रहे हैं॥५॥

**छं०** 
> भट कटत तन सतखंड। पुनि उठत करि पाषंड॥  
> नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड॥६॥

भावार्थ: योद्धाओंके शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। आकाशमें बहुत-सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिरके धड़ दौड़ रहे हैं॥६॥

**छं०** 
> खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल॥७॥

भावार्थ: चील [ या क्रौंच ], कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयङ्कर कट-कट शब्द कर रहे हैं॥७॥

**छं०** 
> कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।  
> बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं॥  
> रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।  
> जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा॥१॥

भावार्थ: सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं [ अथवा खप्पर भर रहे हैं ]। वीर-वैताल खोपड़ियोंपर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं। श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाण योद्धाओंके वक्षः-स्थल, भुजा और सिरोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं। उनके धड़ जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं। फिर उठते और लड़ते हैं और ‘पकड़ो-पकड़ो’ का भयङ्कर शब्द करते हैं॥१॥

**छं०** 
> अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।  
> संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं॥  
> मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।  
> अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे॥२॥

भावार्थ: अँतड़ियोंके एक छोरको पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हींका दूसरा छोर हाथसे पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगरके निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये। बहुत-से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेनाको व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजीकी ओर मुड़े॥२॥

**छं०** 
> सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।  
> करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं॥  
> प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।  
> दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका॥३॥

भावार्थ: अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बारमें श्रीरघुवीरपर छोड़ने लगे। प्रभुने पलभरमें शत्रुओंके बाणोंको काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े। सब राक्षस-सेनापतियोंके हृदयमें दस-दस बाण मारे॥३॥

**छं०** 
> महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।  
> सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी॥  
> सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो।  
> देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर्यो॥ ४ ॥

भावार्थ: योद्धा पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकारकी अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [ राक्षस ] चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियोंको भयभीत देखकर मायाके स्वामी प्रभुने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओंकी सेना एक-दूसरेको रामरूप देखने लगी और आपसमें ही युद्ध करके लड़ मरी॥४॥

**दो०** 
> राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान।  
> करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान॥ २० (क) ॥

भावार्थ: सब [ ‘यही राम है, इसे मारो’ इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण (मोक्ष) पद पाते हैं। कृपानिधान श्रीरामजीने यह उपाय करके क्षणभरमें शत्रुओंको मार डाला॥२० (क)॥

**दो०** 
> हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान।  
> अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान॥ २० (ख) ॥

भावार्थ: देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेकों विमानोंपर सुशोभित हुए चले गये॥२० (ख)॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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