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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 2"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 2

अत्रि-मिलन एवं स्तुति

**चौ०** 
> प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा॥  
> धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं॥१॥

भावार्थ: मन्त्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्रके पास गया, पर श्रीरामजीका विरोधी जानकर इन्द्रने उसको नहीं रखा॥ १ ॥

**चौ०** 
> भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा॥  
> ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका॥२॥

भावार्थ: तब वह निराश हो गया, उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्वासा ऋषिको चक्रसे भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकोंमें थका हुआ और भय-शोकसे व्याकुल होकर भागता फिरा॥ २ ॥

**चौ०** 
> काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही॥  
> मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना॥३॥

भावार्थ: [ पर रखना तो दूर रहा ] किसीने उसे बैठनेतकके लिये नहीं कहा। श्रीरामजीके द्रोहीको कौन रख सकता है? [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत विषके समान हो जाता है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी॥  
> सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता॥४॥

भावार्थ: मित्र सैकड़ों शत्रुओंकी-सी करनी करने लगता है। देवनदी गङ्गाजी उसके लिये वैतरणी ( यमपुरीकी नदी ) हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजीके विमुख होता है, समस्त जगत्‌ उसके लिये अग्निसे भी अधिक गरम ( जलानेवाला ) हो जाता है॥ ४ ॥

**चौ०** 
> नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता॥  
> पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही॥५॥

भावार्थ: नारदजीने जयन्तको व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतोंका चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे [ समझाकर ] तुरंत श्रीरामजीके पास भेज दिया। उसने [ जाकर ] पुकारकर कहा— हे शरणागतके हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये॥ ५ ॥

**चौ०** 
> आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई॥  
> अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई॥६॥

भावार्थ: आतुर और भयभीत जयन्तने जाकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता ( सामर्थ्य )-को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था॥ ६ ॥

**चौ०** 
> निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ॥  
> सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी॥७॥

भावार्थ: अपने किये हुए कर्मसे उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूँ। [ शिवजी कहते हैं— ] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजीने उसकी अत्यन्त आर्त्त [ दुःखभरी ] वाणी सुनकर उसे एक आँखका काना करके छोड़ दिया॥ ७ ॥

**सो०** 
> कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।  
> प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम॥२॥

भावार्थ: उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभुने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजीके समान कृपालु और कौन होगा?॥ २ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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