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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 18"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 18

**चौ०** 
> नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्रव सैल गेरु कै धारा॥  
> खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता॥ १ ॥

भावार्थ: बिना नाक-कानके वह विकराल हो गयी। [ उसके शरीरसे रक्त इस प्रकार बहने लगा ] मानो [ काले ] पर्वतसे गेरूकी धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषणके पास गयी। [ और बोली— ] हे भाई! तुम्हारे पौरुष ( वीरता ) को धिक्कार है, तुम्हारे बलको धिक्कार है॥१॥

**चौ०** 
> तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई॥  
> धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा॥ २ ॥

भावार्थ: उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखाने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसोंने सेना तैयार की। राक्षससमूह झुंड-के-झुंड दौड़े। मानो पंखधारी काजलके पर्वतोंका झुंड हो॥२॥

**चौ०** 
> नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा॥  
> सूपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी॥ ३ ॥

भावार्थ: वे अनेकों प्रकारकी सवारियोंपर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार ( सूरतों ) के हैं। वे अपार हैं और अनेकों प्रकारके असंख्य भयानक हथियार धारण किये हुए हैं। उन्होंने नाक-कान कटी हुई अमङ्गलरूपिणी शूर्पणखाको आगे कर लिया॥३॥

**चौ०** 
> असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी॥  
> गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं॥ ४ ॥

भावार्थ: अनगिनत भयङ्कर अशकुन हो रहे हैं। परन्तु मृत्युके वश होनेके कारण वे सब-के-सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाशमें उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धालोग बहुत ही हर्षित होते हैं॥४॥

**चौ०** 
> कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई॥  
> धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा॥ ५ ॥

भावार्थ: कोई कहता है दोनों भाइयोंको जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्रीको छीन लो। आकाशमण्डल धूलसे भर गया। तब श्रीरामजीने लक्ष्मणजीको बुलाकर उनसे कहा— ॥५॥

**चौ०** 
> लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर॥  
> रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी॥ ६ ॥

भावार्थ: राक्षसोंकी भयानक सेना आ गयी है। जानकीजीको लेकर तुम पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ। सावधान रहना। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथमें धनुष-बाण लिये श्रीसीताजीसहित चले॥६॥

**चौ०** 
> देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा॥७॥

भावार्थ: शत्रुओंकी सेना [ समीप ] चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजीने हँसकर कठिन धनुषको चढ़ाया॥७॥

**छं०** 
> कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।  
> मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥  
> कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।  
> चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै॥

भावार्थ: कठिन धनुष चढ़ाकर सिरपर जटाका जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि (पन्ने) के पर्वतपर करोड़ों बिजलियोंसे दो साँप लड़ रहे हों। कमरमें तरकस कसकर, विशाल भुजाओंमें धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंकी ओर देख रहे हैं। मानो मतवाले हाथियोंके समूहको [ आता ] देखकर सिंह [ उनकी ओर ] ताक रहा हो।

**सो०** 
> आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट।  
> जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज॥१८॥

भावार्थ: ‘पकड़ो-पकड़ो’ पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर (बड़ी तेजीसे) दौड़े हुए आये [ और उन्होंने श्रीरामजीको चारों ओरसे घेर लिया ], जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं॥१८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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