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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 16"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 16

शूर्पणखाकी कथा, शूर्पणखाका खर-दूषणके पास जाना और खर-दूषणादिका वध

**चौ०** 
> धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना॥  
> जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई॥१॥

भावार्थ: धर्म ( के आचरण ) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है—ऐसा वेदोंने वर्णन किया है। और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है॥१॥

**चौ०** 
> सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना॥  
> भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला॥२॥

भावार्थ: वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको ( ज्ञान-विज्ञान आदि किसी ) दूसरे साधनका सहारा ( अपेक्षा ) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल ( प्रसन्न ) होते हैं॥२॥

**चौ०** 
> भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी॥  
> प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती॥३॥

भावार्थ: अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे कहता हूँ—यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणोंके चरणोंमें अत्यन्त प्रीति हो और वेदकी रीतिके अनुसार अपने-अपने [ वर्णाश्रमके ] कर्मोंमें लगा रहे॥ ३ ॥

**चौ०** 
> एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा॥  
> श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं॥४॥

भावार्थ: इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा। तब ( वैराग्य होनेपर ) मेरे धर्म ( भागवतधर्म ) में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा॥ ४॥

**चौ०** 
> संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा॥  
> गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जानै दृढ़ सेवा॥५॥

भावार्थ: जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो;॥ ५॥

**चौ०** 
> मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा॥  
> काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें॥६॥

भावार्थ: मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्‌गद हो जाय और नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ॥ ६॥

**दो०** 
> बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।  
> तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम॥१६॥

भावार्थ: जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय-कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥ १६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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