---
title: "अरण्यकाण्ड दोहा 14"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/aranya-kand/doha-14"
lang: "hi"
---

# अरण्यकाण्ड · दोहा 14

**चौ०** 
> जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा॥  
> गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए॥१॥

भावार्थ: जबसे श्रीरामजीने वहाँ निवास किया तबसे मुनि सुखी हो गये, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभासे छा गये। वे दिनोंदिन अधिक सुहावने ( मालूम ) होने लगे॥१॥

**चौ०** 
> खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं॥  
> सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा॥२॥

भावार्थ: पक्षी और पशुओंके समूह आनन्दित रहते हैं और भौंरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहाँ प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वनका वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते॥२॥

**चौ०** 
> एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना॥  
> सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं॥ ३॥

भावार्थ: एक बार प्रभु श्रीरामजी सुखसे बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजीने उनसे छलरहित ( सरल ) वचन कहे—हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचरके स्वामी! मैं अपने प्रभुकी तरह ( अपना स्वामी समझकर ) आपसे पूछता हूँ॥३॥

**चौ०** 
> मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा॥  
> कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया॥४॥

भावार्थ: हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरण-रजकी ही सेवा करूँ। ज्ञान, वैराग्य और मायाका वर्णन कीजिये; और उस भक्तिको कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं॥४॥

**दो०** 
> ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।  
> जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ॥१४॥

भावार्थ: हे प्रभो! ईश्वर और जीवका भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणोंमें मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जायँ॥१४॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/aranya-kand/doha-13  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/aranya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/aranya-kand/doha-15

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
