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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 12"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 12

**चौ०** 
> एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुंभज रिषि पासा॥  
> बहुत दिवस गुर दरसनु पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ॥ १॥

भावार्थ: ‘एवमस्तु’ ( ऐसा ही हो ) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मीनिवास श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषिके पास चले। [ तब सुतीक्ष्णजी बोले— ] गुरु अगस्त्यजीका दर्शन पाये और इस आश्रममें आये मुझे बहुत दिन हो गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं॥  
> देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसे द्वौ भाई॥२॥

भावार्थ: अब मैं भी प्रभु ( आप ) के साथ गुरुजीके पास चलता हूँ। इसमें हे नाथ! आपपर मेरा कोई एहसान नहीं है। मुनिकी चतुरता देखकर कृपाके भण्डार श्रीरामजीने उनको साथ ले लिया और दोनों भाई हँसने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा॥  
> तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ॥३॥

भावार्थ: रास्तेमें अपनी अनुपम भक्तिका वर्णन करते हुए देवताओंके राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनिके आश्रमपर पहुँचे। सुतीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्यजीके पास गये और दण्डवत् करके ऐसा कहने लगे— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा॥  
> राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही॥४॥

भावार्थ: हे नाथ! अयोध्याके राजा दशरथजीके कुमार जगदाधार श्रीरामचन्द्रजी छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसहित आपसे मिलने आये हैं, जिनका हे देव! आप रात-दिन जप करते रहते हैं॥ ४॥

**चौ०** 
> सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए॥  
> मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई॥५॥

भावार्थ: यह सुनते ही अगस्त्यजी तुरंत ही उठ दौड़े। भगवान्‌को देखते ही उनके नेत्रोंमें [ आनन्द और प्रेमके आँसुओंका ] जल भर आया। दोनों भाई मुनिके चरणकमलोंपर गिर पड़े। ऋषिने [ उठाकर ] बड़े प्रेमसे उन्हें हृदयसे लगा लिया॥ ५॥

**चौ०** 
> सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी॥  
> पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा॥६॥

भावार्थ: ज्ञानी मुनिने आदरपूर्वक कुशल पूछकर उनको लाकर श्रेष्ठ आसनपर बैठाया। फिर बहुत प्रकारसे प्रभुकी पूजा करके कहा—मेरे समान भाग्यवान् आज दूसरा कोई नहीं है॥ ६॥

**चौ०** 
> जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा॥७॥

भावार्थ: वहाँ जहाँतक ( जितने भी ) अन्य मुनिगण थे, सभी आनन्दकन्द श्रीरामजीके दर्शन करके हर्षित हो गये॥ ७॥

**दो०** 
> मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।  
> सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर॥१२॥

भावार्थ: मुनियोंके समूहमें श्रीरामचन्द्रजी सबकी ओर सम्मुख होकर बैठे हैं ( अर्थात् प्रत्येक मुनिको श्रीरामजी अपने ही सामने मुख करके बैठे दिखायी देते हैं और सब मुनि टकटकी लगाये उनके मुखको देख रहे हैं )। ऐसा जान पड़ता है मानो चकोरोंका समुदाय शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी ओर देख रहा हो॥ १२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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