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title: "अरण्यकाण्ड दोहा 10"
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# अरण्यकाण्ड · दोहा 10

**चौ०** 
> मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना॥  
> मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहु आन भरोस न देवक॥१॥

भावार्थ: मुनि अगस्त्यजीके एक सुतीक्ष्ण नामक सुजान ( ज्ञानी ) शिष्य थे, उनकी भगवान्‌में प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्मसे श्रीरामजीके चरणोंके सेवक थे। उन्हें स्वप्नमें भी किसी दूसरे देवताका भरोसा नहीं था॥१॥

**चौ०** 
> प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा॥  
> हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया॥२॥

भावार्थ: उन्होंने ज्यों ही प्रभुका आगमन कानोंसे सुन पाया, त्यों ही अनेक प्रकारके मनोरथ करते हुए वे आतुरता ( शीघ्रता ) से दौड़ चले। हे विधाता! क्या दीनबन्धु श्रीरघुनाथजी मुझ-जैसे दुष्टपर भी दया करेंगे ?॥२॥

**चौ०** 
> सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं॥  
> मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं॥३॥

भावार्थ: क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित मुझसे अपने सेवककी तरह मिलेंगे ? मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास नहीं होता; क्योंकि मेरे मनमें भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा॥  
> एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥४॥

भावार्थ: मैंने न तो सत्सङ्ग, योग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभुके चरणकमलोंमें मेरा दृढ़ अनुराग ही है। हाँ, दयाके भण्डार प्रभुकी एक बान है कि जिसे किसी दूसरेका सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है॥४॥

**चौ०** 
> होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन॥  
> निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी॥५॥

भावार्थ: [ भगवान्‌की इस बानका स्मरण आते ही मुनि आनन्दमग्न होकर मन-ही-मन कहने लगे— ] अहा! भवबन्धनसे छुड़ानेवाले प्रभुके मुखारविन्दको देखकर आज मेरे नेत्र सफल होंगे। [ शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! ज्ञानी मुनि प्रेममें पूर्णरूपसे निमग्न हैं। उनकी वह दशा कही नहीं जाती॥५॥

**चौ०** 
> दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा॥  
> कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई॥६॥

भावार्थ: उन्हें दिशा-विदिशा ( दिशाएँ और उनके कोण आदि ) और रास्ता, कुछ भी नहीं सूझ रहा है। मैं कौन हूँ और कहाँ जा रहा हूँ, यह भी नहीं जानते ( इसका भी ज्ञान नहीं है )। वे कभी पीछे घूमकर फिर आगे चलने लगते हैं और कभी [ प्रभुके ] गुण गा-गाकर नाचने लगते हैं॥६॥

**चौ०** 
> अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई॥  
> अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा॥७॥

भावार्थ: मुनिने प्रगाढ़ प्रेमाभक्ति प्राप्त कर ली। प्रभु श्रीरामजी वृक्षकी आड़में छिपकर [ भक्तकी प्रेमोन्मत्त दशा ] देख रहे हैं। मुनिका अत्यन्त प्रेम देखकर भवभय ( आवागमनके भय ) को हरनेवाले श्रीरघुनाथजी मुनिके हृदयमें प्रकट हो गये॥७॥

**चौ०** 
> मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥  
> तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए॥८॥

भावार्थ: [ हृदयमें प्रभुके दर्शन पाकर ] मुनि बीच रास्तेमें अचल ( स्थिर ) होकर बैठ गये। उनका शरीर रोमाञ्चसे कटहलके फलके समान [ कण्टकित ] हो गया। तब श्रीरघुनाथजी उनके पास चले आये और अपने भक्तकी प्रेमदशा देखकर मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥८॥

**चौ०** 
> मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यान जनित सुख पावा॥  
> भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा॥९॥

भावार्थ: श्रीरामजीने मुनिको बहुत प्रकारसे जगाया, पर मुनि नहीं जागे; क्योंकि उन्हें प्रभुके ध्यानका सुख प्राप्त हो रहा था। तब श्रीरामजीने अपने राजरूपको छिपा लिया और उनके हृदयमें अपना चतुर्भुजरूप प्रकट किया॥९॥

**चौ०** 
> मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें॥  
> आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा॥१०॥

भावार्थ: तब ( अपने इष्ट-स्वरूपके अन्तर्धान होते ही ) मुनि कैसे व्याकुल होकर उठे, जैसे श्रेष्ठ ( मणिधर ) सर्प मणिके बिना व्याकुल हो जाता है। मुनिने अपने सामने सीताजी और लक्ष्मणजीसहित श्यामसुन्दर-विग्रह सुखधाम श्रीरामजीको देखा॥१०॥

**चौ०** 
> परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी॥  
> भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई॥११॥

भावार्थ: प्रेममें मग्न हुए वे बड़भागी श्रेष्ठ मुनि लाठीकी तरह गिरकर श्रीरामजीके चरणोंमें लग गये। श्रीरामजीने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेमसे हृदयसे लगा रखा॥११॥

**चौ०** 
> मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला॥  
> राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा॥१२॥

भावार्थ: कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुनिसे मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोनेके वृक्षसे तमालका वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। मुनि [ निस्तब्ध ] खड़े हुए [ टकटकी लगाकर ] श्रीरामजीका मुख देख रहे हैं, मानो चित्रमें लिखकर बनाये गये हों॥१२॥

**दो०** 
> तब मुनि हृदयँ धीर धरि गहि पद बारहिं बार।  
> निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार॥१०॥

भावार्थ: तब मुनिने हृदयमें धीरज धरकर बार-बार चरणोंको स्पर्श किया। फिर प्रभुको अपने आश्रममें लाकर अनेक प्रकारसे उनकी पूजा की॥१०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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